
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में समय पर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट नहीं हो पाने के पीछे बीमारी का देर से पता चलना, डोनर्स का रजिस्ट्रेशन कम होना और जागरूकता में कमी होना सबसे बड़ी रुकावटें हैं।
देहरादून, 28 मई, 2026 : विश्व ब्लड कैंसर दिवस से पहले, विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि भारत में ब्लड कैंसर के बहुत से मरीजों को अभी भी जान बचाने वाले स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के लिए समय पर मैचिंग डोनर का पता लगाने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, जिसकी वजह से अक्सर बीमारी बढ़ने के साथ-साथ उनके इलाज के लिए कीमती समय भी हाथ से निकल जाता है। भले ही कई तरह के ब्लड कैंसर को पूरी तरह ठीक करने के लिए इलाज का इकलौता विकल्प स्टेम सेल ट्रांसप्लांट ही है, पर दूसरी ओर देश में डोनर्स की भारी कमी, बीमारी का देर से पता चलने और डोनर रजिस्ट्री का दायरा सीमित होने की वजह से पूरे देश में मरीजों को समय पर सही इलाज मिलने में लगातार दिक्कत आ रही है।
भारत में ब्लड कैंसर आज भी सेहत से जुड़ी सबसे गंभीर और जानलेवा समस्याओं में से एक है, जहां हर साल 1 लाख से अधिक लोगों में इसकी पहचान होती है और सालाना 70,000 से अधिक लोग अपनी जान गंवा देते हैं। ब्लड कैंसर से जूझ रहे बहुत से मरीजों के लिए, ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट ही अक्सर जान बचाने और लंबे समय तक ठीक रहने की आखिरी उम्मीद होती है। वैसे तो ट्रांसप्लांट की ज़रूरत वाले लगभग 70% मरीज जान बचाने के लिए ऐसे डोनर्स पर निर्भर होते हैं जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं होता, वहीं भारत की कुल आबादी में से सिर्फ 0.09% लोगों ने ही स्टेम सेल डोनर के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। यही वजह है कि मरीजों के लिए समय पर सही डोनर ढूंढ पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
डोनर्स के आसानी से मिलने से जुड़ी इन चुनौतियों के बावजूद, ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में हुई प्रगति ने उन मरीजों के बचने की उम्मीद काफी बढ़ा दी है जिन्हें यह इलाज मिल पाता है। ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन जानलेवा ब्लड कैंसर से जूझ रहे मरीजों के शरीर में सेहतमंद खून के प्रवाह के साथ-साथ प्रतिरक्षा प्रणाली को फिर से बनाने में मदद करता है। इसके साथ ही, डोनर मैचिंग के बेहतर तरीकों, ट्रांसप्लांट की आधुनिक प्रक्रियाओं, कंडीशनिंग थेरेपी और सहायक देखभाल में सुधारों की वजह से भारत के कई बड़े अस्पतालों और ट्रांसप्लांट सेंटर्स में मरीजों के ठीक होने की दर काफी बेहतर हुई है।
मेदांता सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा में हीमेटो ऑन्कोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट की डायरेक्टर, डॉ. ईशा कौल ने कहा, “ब्लड कैंसर शरीर में बहुत तेज़ी से फैल सकता है, और कई मरीजों की जान बचाने के लिए स्टेम सेल ट्रांसप्लांट ही सबसे बेहतर जरिया होता है। लेकिन भारत में आज भी सबसे बड़ी समस्या यह है कि मरीजों को समय पर सही डोनर नहीं मिल पाता है। गंभीर और तेजी से बढ़ने वाले ब्लड कैंसर के मामलों में, डोनर की तलाश में कुछ महीनों की देरी भी इलाज के नतीजों और उसके बचने की उम्मीदों पर बहुत बुरा असर डाल सकती है। इसलिए, ब्लड स्टेम सेल डोनेशन के बारे में लोगों को जागरूक करना और भारत में डोनर रजिस्ट्री के दायरे को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जरूरत के समय पर ज्यादा से ज्यादा मरीज़ों को ट्रांसप्लांट की सुविधा मिल सके।”
भारत में यह चुनौती इसलिए भी और ज्यादा गंभीर है, क्योंकि स्टेम सेल मैचिंग काफी हद तक आनुवंशिक और एक-समान जातीय समूह पर निर्भर है। डोनर रजिस्ट्रेशन की संख्या कम होने और उसमें अलग-अलग जातियों या क्षेत्रों के लोगों की कमी की वजह से मरीजों को जल्दी से सही डोनर मिलने की संभावना काफी कम हो जाती है, जिससे अक्सर गंभीर ब्लड कैंसर से जूझ रहे मरीजों को सही समय पर इलाज मिलने में देरी होती है।
भारत में ब्लड स्टेम सेल डोनर रजिस्ट्री को जल्द से जल्द मज़बूत करने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए, डीकेएमएस फाउंडेशन इंडिया के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन, पैट्रिक पॉल ने कहा, “भारत में हर साल जान बचाने वाले स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों की तादाद तो बढ़ रही है, लेकिन इसके मुकाबले रजिस्टर्ड डोनर्स की संख्या अभी भी बहुत कम है। ब्लड कैंसर के बहुत से मरीजों के लिए समय पर सही डोनर का मिलना, ज़िंदगी और मौत का सवाल होता है। भले ही अब लोग ब्लड स्टेम सेल डोनेशन के बारे में पहले से ज्यादा जानने लगे हैं, पर इतनी बड़ी आबादी के हिसाब से भारत की डोनर रजिस्ट्री अभी भी बहुत छोटी है। इस डोनर रजिस्ट्री को मज़बूत बनाने और ज्यादा से ज्यादा मरीज़ों को एक नई जिंदगी देने में मदद करने के लिए, युवाओं, शिक्षण संस्थानों, कॉर्पोरेट कंपनियों और समाज के हर वर्ग की भागीदारी बहुत ज़रूरी है।”
भले ही बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे जैसे महानगरों में स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और कॉर्पोरेट कंपनियों की ज्यादा भागीदारी की वजह से ब्लड स्टेम सेल डोनेशन के बारे में जागरूकता बढ़ी है, लेकिन टियर-2, टियर-3 श्रेणी के शहरों तथा ग्रामीण इलाकों से डोनर रजिस्ट्रेशन की संख्या अभी भी बड़े शहरों के मुकाबले काफी कम है।
डॉ. अरुणा राजेंद्रन – असिस्टेंट प्रोफेसर, हीमेटोलॉजी विभाग, इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ एंड हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन, चेन्नई ने कहा, “एक हेमेटोलॉजिस्ट होने के नाते, मैं लगभग रोज ही ब्लड कैंसर की वजह से मरीजों और उनके परिवारों को टूटते हुए देखती हूँ, खासकर तब जब बीमारी का समय पर पता नहीं चलने के कारण इलाज में देरी हो जाती है। बहुत से मरीज बीमारी के शुरुआती लक्षणों को सिर्फ वायरल इन्फेक्शन, मामूली एनीमिया या थकान समझ लेते हैं और किसी स्पेशलिस्ट के पास जाने से पहले कई हफ्तों या महीनों तक जनरल फिजिशियन के चक्कर काटते रहते हैं। कई बार तो कैंसर का पता चलने के डर से भी मरीज और उनके घरवाले जरूरी जांच कराने और डॉक्टरों से मिलने में देरी कर देते हैं, जिससे सही समय पर इलाज मिलने में और भी ज्यादा रुकावट आती है। जब तक वे ऐसे इलाज की सुविधा वाले अस्पतालों तक पहुँचते हैं, तब तक बीमारी काफ़ी बढ़ चुकी होती है, जिससे इलाज के विकल्प और मरीज के बचने की उम्मीदें दोनों कम हो जाती हैं। ब्लड कैंसर के मरीजों में इलाज के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए बेहद जरूरी है कि उन्हें सही वक्त पर इलाज के लिए सही जगह भेजा जाए।”
डॉक्टरों ने यह भी बताया कि बढ़ती जागरूकता और जांच के बेहतर तरीकों की वजह से अब कम उम्र के मरीजों में भी खून की बीमारियों का पता शुरुआत में ही चल रहा है, जिन्हें आगे चलकर लंबे समय के लिए ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है। इसे देखते हुए अब भारत की ब्लड स्टेम सेल डोनर रजिस्ट्री को जल्द से जल्द मज़बूत करना बेहद जरूरी हो गया है।
डॉ. नितिन अग्रवाल, हेड ऑफ़ डोनर रिक्वेस्ट मैनेजमेंट, डीकेएमएस फाउंडेशन इंडिया ने कहा, “भारत में ब्लड स्टेम सेल डोनर्स का रजिस्ट्रेशन नहीं बढ़ने की एक सबसे बड़ी वजह ब्लड स्टेम सेल डोनेशन को लेकर फैली गलतफहमियाँ हैं। बहुत से लोग आज भी सोचते हैं कि इस प्रक्रिया में बहुत दर्द होता है या इसमें चीर-फाड़ की जरूरत होती है, जबकि ज्यादातर मामलों में यह सामान्य रक्तदान जैसा ही आसान होता है और इंसान बहुत जल्दी ठीक हो जाता है। सेहत पर बुरा असर पड़ने का डर भी लोगों को डोनर के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराने से रोकता है, जबकि डॉक्टरों के मुताबिक एक सेहतमंद इंसान के लिए यह पूरी तरह से सुरक्षित है। युवा लोग, खासकर 18 से 35 साल के बीच के लोग डोनर पूल को बढ़ाने और ब्लड कैंसर के मरीजों की जान बचाने वाला डोनर सही समय पर मिलने की संभावनाओं को बेहतर बनाने में भी बड़ा योगदान दे सकते हैं।”
डीकेएमएस फाउंडेशन इंडिया ने साल 2019 में अपनी स्थापना के बाद से अब तक 2.8 लाख से अधिक संभावित ब्लड स्टेम सेल डोनर्स का रजिस्ट्रेशन किया है और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में 250 से ज्यादा मरीजों की मदद की है, जिससे ब्लड कैंसर और खून से जुड़ी दूसरी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई उम्मीद जगी है और उन्हें एक नई ज़िंदगी मिली है।
संभावित स्टेम सेल डोनर के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन कराने के लिए, व्यक्ति की उम्र 18 से 55 साल के बीच होनी चाहिए, तथा उनकी सेहत अच्छी होनी चाहिए। रजिस्ट्रेशन कराने के लिए आपको बस एक आसान सा सहमति फॉर्म भरना होगा। इसके बाद आपके गालों के अंदरूनी हिस्से के टिश्यू सेल्स इकट्ठा करने के लिए स्वैब लिया जाता है, जिसे एचएलए (ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन) के विश्लेषण के लिए लेबोरेटरी में भेजा जाता है। इसके बाद संभावित डोनर का नाम उजागर किए बिना, स्टेम सेल डोनर से मिलान के लिए इंटरनेशनल सर्च प्लेटफ़ॉर्म पर सूचीबद्ध किया जाता है। अगर आप ब्लड स्टेम-सेल डोनर बनने के योग्य हैं, तो आप https://www.dkms-india.org/register-now पर रजिस्ट्रेशन करके अपना होम स्वैब किट ऑर्डर कर सकते हैं और लोगों की जान बचाने की इस मुहिम का हिस्सा बन सकते हैं।
















