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October 3, 2026
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उत्तराखंड

Deputation विवाद के बीच निदेशक भर्ती पर बड़ा प्रस्ताव, 5 अक्टूबर को फैसला

New controversy over Director recruitment Proposal for 'ex-post facto approval' at the October 5 Executive Council meeting; High Court verdict awaited.

देहरादून। वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (VMSB-UTU) में पांच परिसर संस्थानों के निदेशक पदों पर भर्ती प्रक्रिया को लेकर विवाद और गहरा गया है। 25 सितंबर 2026 को निदेशक पदों के लिए साक्षात्कार संपन्न होने के बाद अब 5 अक्टूबर को प्रस्तावित कार्य परिषद की बैठक के एजेंडे में भर्ती नियमों तथा पूर्व में की गई कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव शामिल किया गया है। इससे भर्ती प्रक्रिया की वैधानिकता को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
विश्वविद्यालय की 5 अक्टूबर 2026 की कार्य परिषद की 20वीं बैठक के एजेंडे में वर्ष 2023 की कार्य परिषद की 14वीं बैठक के बिंदु 14-12 में अनुमोदित निदेशक पद के General Recruitment Rules में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है। एजेंडे में संशोधित General Recruitment Rules तथा निदेशक पद के लिए तैयार विज्ञापन को कार्य परिषद से अनुमोदित कराने के साथ-साथ “पूर्व में की गई कार्यवाही को कार्येत्तर स्वीकृति” दिए जाने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
यही बिंदु अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है कि यदि भर्ती प्रक्रिया पहले ही विज्ञापन, आवेदन और 25 सितंबर को साक्षात्कार तक पूरी हो चुकी है, तो उसके बाद भर्ती के नियमों को संशोधित कर पूर्व में की गई कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
हाईकोर्ट में मामला लंबित, फिर इतनी जल्दबाजी क्यों?
निदेशक भर्ती को केवल “On Deputation Basis” किए जाने को लेकर जनहित याचिका पहले से उच्च न्यायालय में विचाराधीन है और भर्ती प्रक्रिया की वैधानिकता पर न्यायालय का निर्णय अभी प्रतीक्षित है। साथ ही, AICTE से संबंधित स्पष्टीकरण/निर्देश की प्रतीक्षा का प्रश्न भी सामने है।
ऐसे में विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की 5 अक्टूबर की बैठक में भर्ती नियमों में संशोधन और पूर्व की कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव कई सवाल खड़े करता है। सवाल यह भी है कि क्या न्यायालय के अंतिम निर्णय और संबंधित नियामक संस्था के स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा किए बिना भर्ती प्रक्रिया को बाद की स्वीकृति के माध्यम से वैधता देने का प्रयास किया जा रहा है?
हालांकि, कार्य परिषद के एजेंडे में प्रस्ताव रखे जाने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोई नियुक्ति अवैध है। इसकी वैधानिकता का अंतिम निर्धारण सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
साक्षात्कार के बाद भर्ती प्रक्रिया कैसे बदलेगी?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब विज्ञापन जारी हो चुका, आवेदन आमंत्रित किए जा चुके और 25 सितंबर को साक्षात्कार भी आयोजित हो चुका है, तब भर्ती प्रक्रिया के नियमों में बाद में परिवर्तन किस सीमा तक किया जा सकता है?
कार्य परिषद के एजेंडे में संशोधित नियमों और विज्ञापन को अनुमोदित करने के साथ पूर्व में की गई कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव स्वयं दर्ज है।
अब नई Institute-wise Preference कैसे ली जा सकती है?
कार्य परिषद के एजेंडे के में उल्लेख है कि पांच परिसर संस्थानों के निदेशक पदों पर साक्षात्कार निर्धारित नियमों, विनियमों एवं प्रक्रिया के अनुसार पूरा किया गया और चयन समिति की संस्तुतियां राज्य सरकार के अनुमोदन के लिए सीलबंद लिफाफे में भेजी जा चुकी हैं। इसमें यह भी दर्ज है कि साक्षात्कार के दौरान अभ्यर्थियों से Institute-wise Preference ली गई थी और चयन समिति ने उन प्राथमिकताओं के आधार पर अपनी संस्तुतियां कीं।
ऐसे में दूसरा बड़ा सवाल यह है कि यदि प्रत्येक परिसर के निदेशक पद के लिए अलग-अलग आवेदन और ₹2,000 आवेदन शुल्क लिया गया था, तो साक्षात्कार के बाद अभ्यर्थियों को दोबारा नई पसंद/चॉइस भरने का अवसर किस नियम के तहत दिया जाएगा? क्या इससे मूल विज्ञापन में निर्धारित आवेदन एवं चयन प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी?
सवाल नंबर-3: पांच पदों के सामने केवल छह अभ्यर्थियों का साक्षात्कार
बताया जा रहा है कि पांच निदेशक पदों के लिए केवल छह अभ्यर्थी ही साक्षात्कार में उपस्थित हुए। ऐसे में यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि इतने कम प्रतिस्पर्धी आधार पर हुई चयन प्रक्रिया को किस नियम के तहत अंतिम रूप दिया जाएगा और क्या प्रत्येक पद के लिए पर्याप्त पात्र अभ्यर्थियों की उपलब्धता तथा चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता का परीक्षण किया गया है?
क्या कार्य परिषद अब पहले से हुई कार्रवाई को वैधता देगी?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 5 अक्टूबर की कार्य परिषद के एजेंडे में केवल भविष्य की भर्ती व्यवस्था तय करने की बात नहीं है, बल्कि संशोधित General Recruitment Rules तथा विज्ञापन को अनुमोदित करने के साथ पूर्व में की गई कार्रवाई को “कार्येत्तर स्वीकृति” देने का प्रस्ताव भी शामिल है।
एजेंडे में यह कहा गया है कि पांचों परिसर संस्थानों के निदेशक पदों पर साक्षात्कार पूरा हो चुका है तथा चयन समिति की संस्तुतियां राज्य सरकार को भेजी जा चुकी हैं। इस पूरे घटनाक्रम से अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या भर्ती प्रक्रिया पहले तय नियमों के अनुसार पूरी की गई थी और अब नियमों में संशोधन किया जा रहा है, या संशोधित नियमों को पूर्व की कार्रवाई पर लागू करने का प्रयास किया जा रहा है?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका उत्तर कार्य परिषद के मूल 2023 के निर्णय, 2026 के संशोधित भर्ती नियम, विज्ञापन, चयन समिति की कार्यवाही तथा सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगा।
अब निगाहें 5 अक्टूबर की कार्य परिषद की बैठक पर हैं—क्या विश्वविद्यालय पहले से पूरी की जा चुकी निदेशक भर्ती प्रक्रिया को कार्येत्तर स्वीकृति देगा, या हाईकोर्ट के निर्णय और AICTE के स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा करेगा? यही प्रश्न इस समय निदेशक भर्ती विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गया है।

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