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एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के शोधकर्ताओं ने भारत के क्लीन एनर्जी मिशन को बढ़ावा देने के लिए, लिक्विड हाइड्रोजन के सुरक्षित परिवहन का नया तरीका खोज निकाला

Researchers at MIT-WPU have discovered a new method for the safe transportation of liquid hydrogen, which could boost India's clean energy mission.
Researchers at MIT-WPU have discovered a new method for the safe transportation of liquid hydrogen, which could boost India's clean energy mission.

देहरादून – 16 दिसंबर 2025 : एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (एमआईटी-डब्ल्यूपीयू) के शोधकर्ताओं ने हाइड्रोजन के परिवहन के लिए बेहद सुरक्षित और किफायती टेक्नोलॉजी विकसित की है, जो भारत के क्लीन एनर्जी के सपने को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, क्योंकि आने वाले समय में अर्थव्यवस्था को कार्बन मुक्त बनाने में हाइड्रोजन की भूमिका सबसे अहम होगी। शोधकर्ताओं की टीम ने लिक्विड ऑर्गेनिक हाइड्रोजन कैरियर सिस्टम बनाने में कामयाबी हासिल की, जिसके ज़रिये हाइड्रोजन का स्टेबल लिक्विड रूप में आसानी से परिवहन किया जा सकता है, जिसमें आग लगने और विस्फोट होने का खतरा नहीं है, साथ ही इसे सामान्य तापमान और दबाव पर आसानी से संभाला जा सकता है। यह नई खोज भारत में हाइड्रोजन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में सबसे बड़ी रुकावटों में से एक को दूर करती है।

इस मौके पर, प्रो. (डॉ.) राजीब कुमार सिन्हाराय, प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर, ने कहा: “शुरुआत के पचास दिनों में हमें कोई नतीजा नहीं दिखा, पर हमने हार नहीं मानी। लगभग दस महीनों में सौ बार ट्रायल करने के बाद, हमने ऐसी बड़ी कामयाबी हासिल की जो पहले कहीं नहीं मिली। पूरा काम शुरू से करना मुश्किल तो था, लेकिन इससे साबित हुआ कि साइंस में सच्ची लगन से लगातार किया गया काम हमेशा सफल होता है।”

इस इनोवेशन की शुरुआत तब हुई, जब ओम क्लीनटेक प्राइवेट लिमिटेड की टीम एक ऐसी समस्या के समाधान के लिए एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के पास पहुँची, जिसका हल आईआईटी सहित देश के कई बड़े संस्थान नहीं निकाल पाए थे। दुनिया में कहीं भी इसे तैयार करने का पहले से कोई लिखित तरीका मौजूद नहीं था, इसलिए रिसर्च टीम ने पूरा कॉन्सेप्ट तैयार किया और शुरू से अंत तक की प्रक्रिया विकसित की। प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर, प्रो. (डॉ.) राजीब कुमार सिन्हाराय ने शुरुआती महीनों को सब्र का इम्तिहान बताया, क्योंकि लगभग पचास दिनों के एक्सपेरिमेंट के बाद भी हमें कोई नतीजा नहीं मिला। लेकिन, साइंटिफिक तरीके से सच्ची लगन के साथ की गई मेहनत का फल मिला, और लगभग दस महीनों में सौ बार ट्रायल करने के बाद टीम ने बड़ी कामयाबी हासिल की। ओम क्लीनटेक प्राइवेट लिमिटेड ने इंटरनेशनल पेटेंट फाइल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, लिहाजा इस प्रोप्राइटरी मेथड की जानकारी गोपनीय रखी जाएगी।

ओम क्लीनटेक प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर, श्री सिद्धार्थ मयूर ने बताया, “इस इनोवेशन की शुरुआत तब हुई, जब h2e पावर ग्रुप की कंपनी, ओम क्लीनटेक प्राइवेट लिमिटेड एक अनसुलझी समस्या के समाधान के लिए एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के पास पहुँची। भारत में इसे तैयार करने का पहले से कोई लिखित तरीका मौजूद नहीं होने की वजह से, रिसर्च टीम और ओसीपीएल की टीम ने साथ मिलकर पूरा कॉन्सेप्ट तैयार किया और शुरू से अंत तक की प्रक्रिया विकसित की। इस तरह हासिल की गई कामयाबी हाइड्रोजन के सुरक्षित तरीके से परिवहन की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो इनोवेटिव और किफायती है, साथ ही इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे इंटरनेशनल पेटेंट फाइलिंग की हमारी कोशिशें को भी मजबूती मिली है। यह रिसर्च नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत के विजन के अनुरूप है, और ओसीपीएल इसे आगे ले जाकर एक कमर्शियल प्रोडक्ट बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

वैसे तो हाइड्रोजन, क्लीन एनर्जी के सबसे बेहतर विकल्पों में एक है, फिर भी बहुत ज़्यादा एक्सप्लोसिव होने और परिवहन के लिए ज़रूरी एक्सट्रीम कंडीशन की वजह से ही हाइड्रोजन को एनर्जी सिस्टम में इंटीग्रेट करना मुश्किल रहा है। फिलहाल, हाइड्रोजन को या तो एटमोस्फेरिक प्रेशर से सैकड़ों गुना ज़्यादा हाई-प्रेशर सिलेंडर में कम्प्रेस किया जाता है, या फिर माइनस 253 डिग्री सेल्सियस से नीचे के तापमान पर उसे लिक्विड बनाया जाता है। दोनों ही तरीकों में बहुत जटिल इन्फ्रास्ट्रक्चर, बहुत अधिक सुरक्षा और ज़्यादा इन्वेस्टमेंट की ज़रूरत होती है, और इन सब पर होने वाला बहुत अधिक खर्च ही हाइड्रोजन परिवहन के सप्लाई चेन में सबसे रुकावट बन जाता है।

एमआईटी-डब्ल्यूपीयू का एलओएचसी इनोवेशन, दो चरणों वाले केमिकल प्रोसेस की मदद से इस समस्या को दूर करता है। हाइड्रोजनेशन फेज़ में, हाइड्रोजन को खास तौर पर डिज़ाइन किए गए एक ऑर्गेनिक लिक्विड के साथ जोड़ा जाता है, जिससे ये गैस बिल्कुल सुरक्षित लिक्विड में बदल जाती है, जिसे रखना और कहीं भी ले जाना बेहद आसान होता है। डीहाइड्रोजनेशन फेज़ में, हाइड्रोजन को उसकी मंजिल पर रिलीज़ किया जाता है, जबकि कैरियर लिक्विड दोबारा इस्तेमाल के लिए उपलब्ध रहता है। इस हाइड्रोजन वाले लिक्विड को संभालना आसान है, जिसका मतलब है कि इसे मौजूदा फ्यूल टैंकरों, स्टोरेज कंटेनरों और यहाँ तक कि स्टैंडर्ड पाइपलाइन नेटवर्क से भी ले जाया जा सकता है, जिससे इन सब पर होने वाला खर्च और परिवहन का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।

लैब ट्रायल के दौरान मिले नतीजों से जाहिर है कि, अब भारत भी एलओएचसी तकनीक को विकसित करने में सबसे आगे है। एमआईटी-डब्ल्यूपीयू की टीम ने केवल दो घंटे में हाइड्रोजन स्टोरेज का काम पूरा किया, जो दुनिया भर की दूसरी रिसर्च में बताए गए अठारह घंटों के मुकाबले काफ़ी तेज़ है। आमतौर पर इसके लिए 170 डिग्री सेल्सियस तापमान की ज़रूरत होती है, लेकिन यह प्रक्रिया केवल 130 डिग्री सेल्सियस पर पूरी हुई, और दबाव भी 56 बार जितना कम रखा गया। हाइड्रोजनेटेड लिक्विड की मदद से, सिर्फ़ 15.6 लीटर के कैरियर में लगभग 11,000 लीटर हाइड्रोजन को स्टोर करना संभव हो पाया। डीहाइड्रोजनेशन के परीक्षणों में, टीम ने स्टोर किए गए हाइड्रोजन का 86 प्रतिशत वापस निकालने में कामयाबी हासिल की, और अब इससे बेहतर परिणाम के लिए आगे की रिसर्च की जा रही है।

प्रो. दत्ता दांडगे, रिसर्च एडवाइजर, ने कहा: “किसी भी दूसरे इंडस्ट्रियल लिक्विड की तरह हाइड्रोजन को आसानी से ले जाने के इस तरीके से सुरक्षा और सरकारी नियमों से जुड़ी पुरानी अड़चनें अब दूर हो जाएँगी। यह कामयाबी देश के लिए पूरे हाइड्रोजन मिशन की रफ्तार बढ़ाने वाली है, साथ ही इससे ट्रांसपोर्ट और बड़े उद्योगों के लिए क्लीन-एनर्जी लॉजिस्टिक्स को नया रूप मिल सकता है।”

प्रो. दत्ता दांडगे, रिसर्च एडवाइजर, ने बताया कि यह टेक्नोलॉजी भारत में क्लीन एनर्जी लॉजिस्टिक्स को पूरी तरह से बदलने वाली है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि, हाइड्रोजन को किसी भी दूसरे इंडस्ट्रियल लिक्विड की तरह ले जाने की क्षमता से सुरक्षा और सरकारी नियमों से जुड़ी पुरानी अड़चनें अब दूर होंगी। इस तरह, यह आने वाले समय में परिवहन और बड़े उद्योगों के लिए ईंधन के तौर पर आसानी से उपलब्ध होगा।

एमआईटी-डब्ल्यूपीयू की अत्याधुनिक सुविधाओं वाली हाइड्रोजन लैब में यह रिसर्च की गई, जिसमें लगा ऑटोक्लेव सिस्टम 350 डिग्री सेल्सियस तापमान और 200 बार तक के दबाव पर काम कर सकता है। लैब में मिली इस कामयाबी को उद्योगों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए सुलभ बनाना ही इस टीम का लक्ष्य है, जिसके लिए पूरी प्रक्रिया को और बेहतर बनाया जा रहा है।

एमआईटी-डब्ल्यूपीयू में प्रोजेक्ट फेलो और पीएचडी के छात्र, निशांत पाटिल ने बताया: “इतनी बड़ी कामयाबी देश के लिए काफी मायने रखती है, जिसमें काम करने का अनुभव मेरे लिए बेहद खास रहा है। इससे भारत के क्लीन-एनर्जी भविष्य को नया रूप देने वाले इनोवेशन में योगदान देने का मेरा इरादा और मज़बूत हुआ।”

इस टेक्नोलॉजी को विकसित करने में योगदान देने वाले, प्रोजेक्ट फेलो निशांत पाटिल के लिए यह प्रोजेक्ट बेहद खास रहा है, जिससे उन्हें काफी कुछ सीखने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि, देश के लिए काफी मायने रखने वाली इतनी बड़ी कामयाबी पर काम करने से भारत के बदलते क्लीन एनर्जी माहौल में इनोवेशन को आगे बढ़ाने का उनका इरादा और मजबूत हुआ।